Saturday, May 20, 2017

तुम संग

शब्दों का रह-रह कर के,यूँ बातों में ढलना,
यहाँ-वहाँ,जहाँ-तहाँ की,उन बातों का कहना,
यूूँ शब्द-शब्द गुनना,और बात-बात जीना,
तुम संग तुममें ढलना,इक सुखद एहसास है।

मंजिलों की राहें हैं,बड़ी उलझी-उलझी सी,
कभी लगें बोझिल ये,कभी लगें सुलझी सी,
कदम-कदम साथ हो,और हाथों में हाथ हो,
तुम संग यूँ चलना,इक सुखद एहसास है।

वर्षा की रिमझिम,और कली-कली जगना,
फूल-फूल खिलना,और भंवरों संग डोलना,
गुज़रना मौसमों का,क्षितिज का ये मिलना,
तुम संग सब जीना,इक सुखद एहसास है।

तुम्हारी बातों की,उलझी-सुलझी सी तारुनाई,
अनजानी सी राहों की,अनजानी सी सच्चाई,
आसमान के अनंत संग,ये धरती की गहराई,
तुम संग यूँ समझना,इक सुखद एहसास है।

जीवन के उतार-चढ़ाव,ये जीवन की सार्थकता,
जीवन के येे गीत-राग,और जीवन की मधुरता,
शब्दों की मिठास भरा,छलकता सा ये प्याला,
तुम संग घूँट-घूँट पीना,इक सुखद अहसास है।

                                                                             
                                                                                         ( जयश्री वर्मा )

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