Wednesday, April 8, 2015

ओ प्रिये मेरी !

ओ प्रिये मेरी ! संगिनी मेरी ! ओ मेरे सपनों की रानी,
तुम बनी हो जब से मेरे इस जीवन की अमिट कहानी,
मैंने पाकर तुम्हें अपने साथ में धन्य खुद को है माना,
पर आसान नहीं है विवाह बंधन को यूँ निभा ले जाना ।

पहली रात से ही तुमने बनाई अजब वसूली की रीत,
जैसे कंगन,हार या झुमके पे ही टिकी हो मेरी ये प्रीत,
उस उपहार की कीमत से मेरा प्यार परखा था तुमने,
तुम्हारी मधुर मुस्कराहट पे दिल हार दिया था हमने। 

विवाह के साथ ही जैसे ये हक़ लेकर के तुम थीं आईं,
मैंने जुटाया मेहनत से और मालकिन तुम कहलाईं,
आते ही टोका-टाकी संग मुझे जीने के ढंग सिखाए,
सज्जनता,सलीके से रहने के पाठ भी नए थे पढ़ाए।

मैं क्या खाऊंगा,पहनूंगा क्या,सबपे रही नज़र तुम्हारी,
मैं कहाँ गया,किससे बोला,इन सबपे बिठाई पहरेदारी,
ज़रा टाल-मटोल करने पे तुमने तेवर तीखे दिखलाए,
बाहर अफ़सर,घर में क्या हूँ इसके फर्क मुझे समझाए।

आसान नहीं था तुमसे कोई भी बात छिपा ले जाना,
किससे सीखा गुर ये तुमने ? खुद में जासूस जगाना,
कितनी बार कुरेद-कुरेद के कई सच तुमने उगलवाए,
हमें शर्मिंदा करके चेहरे पे विजय मुस्कान तुम लाए। 

पर जब गलती खुद से होती तो भोली तुम बन जातीं,
तब हर-हाल में रो-रो के तुम अपनी ही बात मनवातीं,
रूठ जाओ तुम तो तुम्हें मनाना भी तो आसान नहीं है,
हर ख़ुशी के पीछे छिपी,ब्लैकमेलिंग की अदा कहीं है।

जीवन सफ़र कठिन था,हंसना-रोना,रूठना और मानना,
इस समाज में खुद को अच्छा पति बन करके दिखलाना,
जिम्मेदार हुआ प्रिये मैं तुम्हारे ही संग में चलते-चलते,
किनारा भी दिखने लगा यूँ उम्मीदों के संग पलते-पलते।

मैं प्रिये अब हुआ हूँ वृद्ध,तुम्हारे साथ में जीते और मरते,
कभी मैं हँसा,झुंझलाया कभी,कटी कभी तू-तू,मैं-मैं करते,
अब ओ प्रिये!मुझे तो तुम झुर्रियों संग भी भली लगती हो,
मेरे इस जीवन में तुम नित-नव आशाओं सी जगती हो।

मैंने जीवन में अब जाकर बहुमूल्य मोल तुम्हारा है जाना,
धूप-छाँव और सुबह-साँझ के सुखमय मेल को भी पहचाना,
तुम दूर न जाना ओ प्रिये मेरी इन पलकों से ओझल हो के,
मेरे लिए तो ओ प्रिये!अब तुम हो,मुझमें मुझसे भी बढ़ के।

                                                                             जयश्री वर्मा