Thursday, November 13, 2014

ज़माना हमारा-तुम्हारा

वो पर्दों के अंदर चुपके-छुपके झांकती निगाहें,
लाज भरी खिलखिलाहटें औरसिमटी सी बाहें,
कहीं पे खो सा गया है शर्मिंदगी का वो उजाला,
आधुनिकता ने आज सबको बेबाक बना डाला।

अब बागों में है कुछ सहमी सी हवा की रवानी,
वो सूखे दरख्तो पे गूंजती हरियाली की कहानी,
वो भवरों का कलियों-फूलों में सुगंध को ढूंढना,
अब जैसे है बेरौनक फूलों की बुझी सी जवानी।

विवाह जोड़ मिलाना सुसम्पन्न वर-वधू प्यारे,
अब बेलगाम बातें हैं और बेलगाम से हैं इशारे,
क्यों बेरौनक से हो चले ख्वाब युवाओं के सारे,
लिहाज़ छोड़ अब बेशर्मी का समां सा छा गया।

न बड़ों का सम्मान है न छोटों से है कुछ लगाव,
बस दिखता है सिर्फ अपने सुख-दुःख का बहाव,
ज़माना कहाँ से चला था और अब कहाँ आ गया,
आज की उच्श्रृंखलता ने देखो अदब मार डाला।

न दादी की बातें हैं और न है अब नानी का प्यार,
न रहे खेल निश्छल निराले,न झूले और बरसात,
टी०वी०,कम्प्यूटर के हिंसक खेल के अब ज़माने,
ये बच्चे भटककर आज अनजाने ही कहाँ आ गए।

ये फिसलन है गहरी जो अब नहीं है रुकने वाली,
बस बेख़ौफ़ उच्श्रृंखलता और बात-बात में गाली,
स्वार्थ को सिर्फ जानते हैं परमार्थ से है किनारा,
अब खो गया है वो कहीं-ज़माना हमारा-तुम्हारा।

                                               ( जयश्री वर्मा )