Wednesday, April 25, 2012

बंदिश


                                                                
विवाह- 
जन्मों का बंधन,पर उसके कैसे हैं ये ढंग?
जीना था मुझको भी अपने सपनों के संग,
पंख क्यों काटे और क्यों छीन ली उड़ान,
मेरा भी हक था,क्यों छीना ये आसमान ।

ये धरती,ये अम्बर और झरनों की झर-झर,
ये चिड़ियों का चहकना ये हवा का बहकना,
ये पत्तों की सरसराहट ये मौसम की आहट,
फूलों का खिलना और दिन-रात का ढलना,
बच्चों की भाषा और उनके बढ़ने की आशा,

ये माँ-माँ पुकारना,ये बिखेरना,वो संवारना,
अपनों से मिलना,और रिश्तों को सिलना, 
ईश्वर ने साँसों से सबको बराबर नवाज़ा है,
तुम्हारा ही हक नहीं,ये उतना ही हमारा है,
फिर क्यों बंदिशें हैं? तब क्यों ये रंजिशें हैं?

क्यों प्रश्नों की कारा में,यूं छोड़ रहे हो मुझे,
जोड़ना था खुदसे,क्यों यूँ तोड़ रहे हो मुझे,
प्रश्नों के जाल में यूँ क्यों छोड़ रहे हो मुझे,
मुझको भी ये जीवन रस, घूँट-घूँट पीना है,  
मुझको भी तो तुम संग हर कदम जीना है। 
  
                                                                            (जयश्री वर्मा )

Tuesday, April 17, 2012

आस

                                                                      
संकल्प लिया तो,
जलने दो मशाल,
मशाल से मशाल को जगाने दो,
मनोरथ पूर्ण होने पर,
जब बुझाना पड़े तो,
छोड़ देना एक चिंगारी,
सुलगते हुए,
ताकि -
आह्वान किया था कभी,
इसका एहसास तो रहे,
और दुबारा उठ खड़े होने की,
आस तो रहे।
ऐ माली,
जब चुनने के लिए आओ,
डाली के फूलों को तो -
तो कहीं किसी डाल पर,
छोड़ देना एक फूल,
खिला हुआ,
ताकि -
बाँझ नहीं है पेड़,
उमंगों से हरा-भरा,
झूमता था कभी,
इसका एहसास तो रहे,
और दुबारा खिलने की,
आस तो रहे।
हे ईश्वर !
जब यह जीवन करना हो,
समाप्त तुम्हें मेरा,
तो छोड़ देना एक सांस,
मेरे अंदर,
ताकि -
मेरे जीवित रहने की,
मेरे इंतज़ार करने की,
प्यास तो रहे, 
जो भागता आ रहा है,
सिर्फ एक नज़र देखने को,
गिले-शिकवों को,
दूर कर सकने की,
आस तो रहे।
                                 
                                     ( जयश्री वर्मा ) 

Monday, April 16, 2012

जीवन सत्य

                                                                         
पतझर नहीं तो बोल रे मानुस,
बसंत का है क्या मोल ?
फिर जीवन ठूठ सा क्यों कहता ?
जीवन पुष्प सा तू बोल।
दुःख न हो तो बोल रे मानुस,
सुख का है क्या मोल,
फिर जीवन अश्क सा क्यों कहता ?
जीवन आस सा तू बोल।

दर्द न हो तो बोल रे मानुस,
हंसी का है क्या मोल,
फिर जीवन श्राप सा क्यों कहता ?
जीवन छंद सा तू बोल।

जरा नहीं तो बोल रे मानुस,
यौवन का है क्या मोल,
फिर जीवन बोझ सा क्यों कहता ?
यह जीवन उमंग सा तू बोल।

मृत्यु नहीं तो बोल रे मानुस,
जन्म का है क्या मोल,
फिर जीवन क्षणभंगुर क्यों कहता,
जीवन अमरत्व  सा तू बोल ।  
                                                           ( जयश्री वर्मा ) 

Sunday, April 15, 2012

सन्देश

मित्रों ! मेरी यह रचना मासिक पत्र " मृगपाल " ( सितम्बर 1995 अंक ) जो कि झाँसी से प्रकाशित है में प्रकाशित हुई है , आप भी इस रचना को पढ़ें !                                                                


चिंताएं जिससे डरती थीं,
मुस्कानें जिस पर मरतीं थीं,
अपना प्यारा भोला-भला वो,
बचपन कितना प्यारा था।

दादी की कहानी राजा- रानी,
परियों की नगरी में रहते थे,
अपनी दुनिया के शेर बने,
हम नहीं किसी की सहते थे।

तब नहीं थी कोई छूत-छात,
तब नहीं थी कोई जात-पात,
तब नहीं था कोई धर्म-वर्म,
तब नहीं था कोई प्रान्त-व्रांत।

बड़े हुए तो सब छिन गया,
वह अपनापन, वह प्रेम प्यार,
चार धर्म की बात तो छोड़ो,
हर धर्म में ही कई जात-पात।

एक ही धरती पर पैदा हो,
धरती के टुकड़ों को लड़ते हैं,
धरती माँ के लाल आज,
आपस में कटते मरते हैं।

भारत माँ के हम चार पुत्र,
हिन्दू ,मुस्लिम,सिख,ईसाई,
माँ को कितना दुःख होता होगा,
लड़ पड़ते जब भाई-भाई।

हम एक छत के चार खंभ,
जब बंट कर अलग हो जायेंगे,
गिर पड़ेगी टूटकर घर की छत,
तब क्या हासिल कर पायेंगे।

जागो-चेतो ऐ माँ के बेटों,
अब भी कुछ नहीं बिगड़ा,
जो हुई हानि वो भूल जाओ,
छोड़ो आपसी लड़ाई झगड़ा।

तुम नहीं समझ रहे दुश्मन को,
वो बहुत चतुर है बहुत सबल,
अगर अभी नहीं संभले तुम तो,
फिर नहीं निकलेगा कोई हल।

तुम नहीं सिख, तुम नहीं हिन्दू ,
न मुस्लिम और न ईसाई हो,
तुम सब हो एक आँचल के लाल,
तुम एक ही घर के भाई हो ।

न कश्मीर,न असम और,
न खालिस्तान हमारा है,
यह हिंदुस्तान हमारा है,
यह भारत देश हमारा है।

युगों-युगों,लहरा-लहरा कर,
गाए यह गीत तिरंगा प्यारा,
"सारे जहाँ से अच्छा, हिन्दुस्तान हमारा,
हम बुलबुले हैं इसकी,ये गुलसितां हमारा "।

                                                                       ( जयश्री वर्मा )
   
  
       

Saturday, April 14, 2012

बसंत ख़ुमार

                                                                  
हवा में खुशबुएँ हैं,
बसंत की आहट है,
फूलों पर रंग बिखरे,
भवरों की चाहत है,
तितलियाँ संवर रहीं, 
अंग रंग भर रहीं,
फूलों में छुपतीं-निकलतीं,
अठखेलियाँ कर रहीं,
खिलखिलाहट बगियों की,
चहचहाहट चिड़ियों की,
अजीब सी सरसराहट है ,
फूलों और कलियों की,
ऐसे में सब जोड़ों के,
खिले-खिले चेहरे हैं,
मन में उमंग लहर,
नयन भाव गहरे हैं,
बिन बोले ये कहते हैं,
बिन कहे सुनते हैं,
उठते हैं , झुकते हैं,
अफसाने गढ़ते है,
जन्मों के,सदियों के,
अटूट वादे ये करते हैं,
अजीब सा ख़ुमार है,
ये अलबेला प्यार है,
हवा में खुशबुएँ हैं,
बहका सारा संसार है।
दोष नहीं किसी का,
बसंत की बयार में,
ये बसंत का ख़ुमार है।
                                 
                                         ( जयश्री वर्मा )

        

Friday, April 13, 2012

पावन जल धार

                                                              
स्वच्छ, धवल,कंचन नील अंचल सी,
कल-कल,छल-छल नित हलचल सी,
इक नदी बह रही शांति से,चंचल सी,
सदा से रही जो जीव का संबल सी।
यह जग जननी है अनजानी सी,
और मृत्यु भी सत्य है पानी सी,
यह विश्वस्त सखी पहचानी सी,
हर मानव जीवन की कहानी सी ।

इसकी हर लहर दीप्त है तारा सी,
जीव के उत्थान पतन की कारा सी,
ये कभी तो बही अमृत की धारा सी,
और कभी ये उफन पड़ी अंगारा सी ।

तू कहीं पे कहलाई पावनी गंगा सी,
कहीं पे मचल पड़ी अलकनंदा सी,
ओ पावन स्वर्ग लोक की बाला सी,
है शत-शत प्रणाम जग माला सी।

                                                                        ( जयश्री वर्मा )

Wednesday, April 11, 2012

प्रिय की बतियाँ

मित्रों ! मेरी यह रचना मासिक पत्र " मृगपाल " सितम्बर 1995 अंक में जो कि झाँसी से प्रकाशित है में प्रकाशित हुई।  आप भी इस रचना को पढ़ें।


हर वर्ष बदलते मौसम सी,
कई रूप रंग कई वर्णों सी,
चंचल चंदा की किरणों सी,
पुष्पों पे रंग बलिहारी सी,
                    
मेरे प्रिय की बतियाँ री सखि,
हैं बहुत मधुर - मतवारी सी।

सावन की रिमझिम बूंदों सी,
पावन  गंगा की लहरों सी,
बसंत की पीत छटा जैसी,
हरियाली सी मनहारी सी,
                     
मेरे प्रिय की बतियाँ री सखि,
हैं बहुत मधुर - मतवारी सी।

आह में अश्क सरीखी सी,
गान की झनक फुलझरी सी,
स्वप्नों में स्वप्न परी जैसी,
रंगों की प्रेम फुहारी सी,
                      
मेरे प्रिय की बतियाँ री सखि,
हैं बहुत मधुर - मतवारी सी।

गोरी बहियों के कंगन सी,
बहके प्रेम की अनबन सी,
पावों में रुनझुन पायल सी,
कभी इठलाती बंजारन  सी,
                      
मेरे प्रिय की बतियाँ री सखि,
हैं बहुत मधुर - मतवारी सी।

माथे पे सोहित बिंदिया सी,
नासिका की सुंदर नथिया सी,
कामिनी के तीखे कटाक्ष जैसी,
मनभावनी अँखियाँ कजरारी सी,
                   
मेरे प्रिय की बतियाँ री सखि,
हैं बहुत मधुर - मतवारी सी।

कुछ खट्टी सी,कुछ मीठी सी,
कुछ तीखी सी,कुछ प्यारी सी,
कुछ गुनगुन सी,कुछ रुनझुन सी,
कुछ हलकी सी,कुछ भारी सी,
                 
मेरे प्रिय की बतियाँ री सखि,
हैं बहुत मधुर - मतवारी सी।

                                      ( जयश्री वर्मा ) 



 

Tuesday, April 10, 2012

चार पहर

                                                                       
सुबह के सूरज ने,
किरणों की बाहें फैलाईं,
और कहा- उठ 
नए दिन, नए जीवन का, 
अध्याय प्रारंभ कर, 
मैंने आंखें खोलीं,
नए उत्साह और किलकारियों के साथ,
इस अजीबोगरीब दुनिया का 
सब कुछ जान लेने को उत्सुक,
मैं उठा,नेत्रों में जिज्ञासा,
और हृदय में उत्साह  लिए,
इतने में दोपहर आई और बोली,
यौवन राहस्य जानना चाहते हो ?
यह कह उसने,छलकता हुआ -
मादकता का प्याला बढ़ाया,
मैंने पिया और बहकता चला गया,
अपनी ही रौ मैं बहता चला गया,
तभी संध्या ने ताना मारा-
सारे दिन भटके,
क्या हासिल किया ?
मैंने पाया-
मेरे तो हाथ खाली थे,
चेहरे पर भटकन की झुर्रियां,
शिथिल शरीर के साथ,
अन्यमनस्क सा सोचता रहा,
काश मैं भी किसी के लिए जिया होता,
आज कोई तो होता जो कहता-
मैं तेरा हूँ , तू मेरा है,
कितनी नीरव और एकाकी है,
यह वीरानी संध्या,
मैंने चाहा - सचेत करना,
आने वाली पीढ़ी को -
की जिओ पर सिर्फ अपने लिए ही नहीं-
औरों के लिए भी सीखो-त्याग,
औरों  के लिए भी सीखो-जीना,
मगर-
उम्र धोखा दे गई,
रात्रि आई ,बोली-
चल मेरे साथ,
तेरा अध्याय समाप्त हुआ ।
                                                     
                                       ( जयश्री वर्मा )   


Sunday, April 8, 2012

सहजता

                                                                        
इस अहम् की उलझी सी गांठें तो खोलो,
आखिर अब तुम दो बोल तो मीठे बोलो,
बात मानो,सारी कड़वाहट धुल जायेगी,
भावों में अपनेपन के शब्द तो घोलो।

जीवन तो बस कुछ ही दिनों का मेला है,
मिलते-बिछड़ते हुए रिश्तों का रेला है,
क्रोध,सुख,आस,अपनत्व,पीड़ा,अहसास ,
इच्छाओं की कभी न बुझने वाली प्यास।

जग में जो आया,कुछ खोया- कुछ पाया,
है जन्मा गर कोई, मृत्यु कौन रोक पाया ?
पर देखा जाए सत्य, तो यही तो संसार है,
जन्म से पहले और मृत्यु बाद का क्या सार है ?

यहीं पे बने रिश्ते और यहीं मिला प्यार है,
यहीं परिजनों संग बांटा जीवन का भार है,
गर नहीं होते ये सब तो तुम कैसे जी पाते ?
दिन-दिन रोते और रात-रात छटपटाते।

बात मान लो मेरी,वरना तुम टूट जाओगे,
चुप्पी तो तोड़ो, अन्यथा कठोर कहलाओगे, 
मुस्कुराहट से अपनी,दिल के घाव धो लो,
इन भावों में अपनेपन के शब्द तो घोलो ।

अहम् की गांठें तो खोलो,
अरे अब दो बोलो तो मीठे बोलो,
बात सच मानो,ये सारी कड़वाहट धुल जायेगी,
भावों में अपनेपन के शब्द तो घोलो।

                                   
                                              ( जयश्री वर्मा ) 
                                                      

Saturday, April 7, 2012

कर्तव्यबोध

तुम विराट सत्ता के स्वामी,
मैं जल की क्षीण रेख सा हूँ,
तुम शिला सरीखे आ जाओ,
मुझको तो राह बनानी है।


आज कैद मुठ्ठी का अंकुर हूँ,
तुम कितना गहरा गाड़ोगे,
कल धरा फोड़ मुस्काऊंगा,
मुझको तो राह बनानी है।


तम साम्राज्य के शासक तुम,
गहन अन्धकार बन छा जाओ,
मैं दीपक की लौ बन जाऊँगा,
मुझको तो राह बनानी है।



छोटों को क्या कुचलोगे तुम ,
तूफानों से कब उखड़ा है कुश,
झुककर के बच जाऊँगा मैं,
मुझको तो राह बनानी है।


तुम सामंत वर्ग तुम पूज्य वर्ग,
तुम जकड़े समाज के बंधन में,
डर होगा तुम्हें प्रतिष्ठा का,
मुझको तो राह बनानी है।
                              
                                      जयश्री वर्मा 

Friday, April 6, 2012

क्षणिकाएँ

                                                          
                                                                     धर्म 


 


ईश्वर की कल्पना,
बंद आँखों का सपना,
मन की दुर्बलता,
आत्मविश्वाश का हनन,
और,
स्वतंत्रता का अपरहरण,
करता है- धर्म । 
                        (जयश्री वर्मा )

                                                                    





   
 अफसर 


खाने- पीने  से लेकर -
नोटों से खरीदी जा सकने वाली,
हर चीज़ को,
हज़म कर सकने,
की क्षमता वाला,
अच्छे हाजमे का व्यक्ति ।
                                (जयश्री वर्मा )
                              

Thursday, April 5, 2012

प्रेम रहस्य

                                                                 

तुम संग ओ सांवरे,
नयन मिले बावरे,
 
झुके उठे , उठे झुके,
लजाते से रुके - रुके,

अंखियों के अंखियों से-
कई प्रश्न हुए, हल हुए,

न जाने क्या बात हुई,
और खुल गए भेद कई ।
                       

                   (जयश्री वर्मा)

Wednesday, April 4, 2012

चुनौती

मित्रों ! मेरी यह रचना पूर्वोत्तर रेलवे की पत्रिका " रेल - रश्मि "में अप्रैल 1987 में प्रकाशित हुई , उस समय पूर्वोत्तर रेलवे के महाप्रबंधक श्री योगेन्द्र बिहारी लाल माथुर थे। आप भी रचना को पढ़ें।                                                                      

तुम मुझे समाप्त नहीं कर सकोगे काल,
मैं तुम्हें अमर बन कर दिखलाऊंगा,
और तुम ?
तुम हाथ मलते रह जाओगे।
मैं बहार नहीं,
कि तुम मुझे खिज़ा में बदल दो,
मै बहारों का वो गीत हूँ,
जो हर वर्ष गाया जायेगा -
पीढ़ी दर पीढ़ी द्वारा,
और पीढ़ियाँ कभी समाप्त नहीं होतीं।
मैं नदी की कल-कल नहीं,
कि तुम मुझे शांत कर दोगे -सुखाकर,
मैं वर्षा की रिमझिम हूँ,
हर आने वाले मौसम का संगीत हूँ,
जो रोके रुक नहीं सकता।
मैं पत्थर की ऋचा नहीं,
कि तुम मुझे मिटा दोगे खण्ड - खण्ड करके,     
मैं पर्वतों की अडिगता हूँ,
और अडिगता स्वयं समर्थ है।
मैं देवता नहीं,
कि जिसे अपना अस्तित्व बनाए रखने के लिए,
भिन्न- भिन्न धर्मों में,
भिन्न - भिन्न नामों से जन्म लेना पड़ता है,
मैं मानव हूँ काल,
मैं वो मानव हूँ,
जिसके अंतर में-
भावनाओं से ओत -प्रोत हृदय है,
और भावनाएं सिर्फ जन्म लेती हैं ,
मिटती नहीं।
तुम मुझसे हार जाओगे काल,
तुम मुझे समाप्त नहीं कर सकोगे ।

                                                              ( जयश्री वर्मा )   

Tuesday, April 3, 2012

बचपन














जिससे कि चिंताएं डरती हैं,
मुस्कानें जिसपर मरती हैं,
सभी जिसको अपने प्यारे,
सुख सपने हैं जिसके न्यारे,
हठ के आगे दुनिया झुकती,
चिंता तो दो कोस दूर रूकती,
और क्रोध सदा हारा जिससे,
मीठी बातें और मीठे किस्से,
वन पुष्प सदृश्य खिला-खिला,
मन जिसको साफ़ पवित्र मिला,
बाधाएं न रोक सकीं जिसको,
स्वच्छंद हवा का इक झोंका है,
ये बचपन,प्यारा होता है,
ये सबसे न्यारा होता होता है।
                           
              ( जयश्री वर्मा )

Monday, April 2, 2012

याद पन्छी

                                                            

इस पार से उस पार ,
उस पार से इस पार को ,
मंथर गति से ,
आती जाती नौकाओं की तरह ,
मिनट ,घंटे ,दिन ,सप्ताह ,
महीने और फिर साल ,
आते और जाते रहेंगे ,
लकिन हमारा पुराना ,
साथ -साथ बीता हुआ कल,
मधुर कल ,
पुनः लौट कर नहीं आएगा ,
ऐसे ही जैसे -
आज का दिन ,
हम एक दूसरे के पास हैं ,
हम चाहते हैं -
कल न आए ,
जो हमें एक दूसरे से अलग कर दे ,
हम चाहते हैं -
ये पल यहीं थम जाए ,
वक्त आगे न बढ़ पाए ,
ये लम्हा ठहर जाए ,
पर असंभव !
समय को कौन रोक पाया ,
रेत कौन भींच पाया,
लकिन एक चीज़ संभव है ,
मेरे वश में है ,
तुम्हारा याद पंछी,
जो सदा मेरे  पास रहेगा ,
तुम्हारे साथ का अहसास रहेगा
जिसे मैंने,
अपने मन पिंजरे में ,
कैद कर लिया है |
                                                     (जयश्री वर्मा)                                                   

Sunday, April 1, 2012

नदी

                                                                                                                                                        
ऊँचे पर्वतों की चोटियों से निकल,
ऊबड़-खाबड़ पत्थरीले पत्थरों में से,
सहजता संग रास्ता अपना बनाती,
कितने ही अनजान पेचीदे से मोड़ों से,
कितने ही अनजान कठोर से रोड़ों से,
गुज़ार जाती है जीवंत ज़िन्दगी - नदी। 

उछल-उछल,चट्टानों से टकराती ,
वज़ूद की जद्दोजहद से भी लड़ती,
पीड़ा सहकर भी न कहती,कराहती,
अपनी ही धुन में मगन बहती और,
नव जीवन नव राग की धुन संग,
कल कल संगीत संग बहती जाती-नदी। 

फिर-फिर,चट्टान रुपी इस जीवन से,
नाव उत्साह से हो लड़ने को तत्पर ,
बिना कुछ कहे नए रास्तों के साथ,
थाम के शान्ति और जज़्बे का हाथ,
देती मृतको तो तर्पण,जीवों को जीवन,
और सदा ही आगे की ओर बढ़ती जाती - नदी। 

चिलचिलाती सी धूप की तपन हो,
या फिर रात की अंधियारी कालिमा,
रुके बिना ही ये कर्त्तव्य परायणा,
धरा का हरियाली से श्रंगार करती,
ज़िन्दगी जीने का सन्देश सा देती ,
शाश्वत काल से चुप-चाप,बहती जाती -नदी। 
                                                             
                                                                                 ( जयश्री वर्मा )